गाजियाबाद में अस्पताल या मौत के अड्डे?
मानकों को रौंदकर चल रहे निजी हॉस्पिटल, प्रशासन की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल

गाजियाबाद। जिस अस्पताल में लोग अपनी जिंदगी बचाने जाते हैं… अगर वही अस्पताल खुद मौत के मुहाने पर खड़ा हो तो इसे क्या कहा जाए?
गाजियाबाद में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर चल रहे कई निजी अस्पताल अब सवालों के घेरे में हैं। आरोप हैं कि शहर के कई अस्पताल बिना मानकों, बिना पर्याप्त फायर सेफ्टी, बिना पार्किंग व्यवस्था और बिना आपातकालीन सुरक्षा इंतजामों के धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार विभाग सबकुछ देखकर भी आंखें मूंदे बैठे हैं।

शहर के कई इलाकों—नेहरू नगर, आरडीसी, राजनगर एक्सटेंशन, साहिबाबाद, वैशाली और इंदिरापुरम—में बहुमंजिला इमारतों में चल रहे अस्पतालों की स्थिति किसी टाइम बम से कम नहीं बताई जा रही। कहीं बेसमेंट में अवैध ICU बनाए गए हैं, तो कहीं संकरी गलियों में ऐसे अस्पताल संचालित हैं जहां आग लगने की स्थिति में एम्बुलेंस तक नहीं पहुंच सकती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन अस्पतालों को लाइसेंस कैसे मिल रहे हैं?
क्या स्वास्थ्य विभाग, अग्निशमन विभाग, जीडीए और नगर निगम की संयुक्त जिम्मेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित है?
या फिर अस्पतालों के इस “माफिया नेटवर्क” के आगे पूरा प्रशासनिक ढांचा नतमस्तक हो चुका है?
सूत्रों की मानें तो कई अस्पतालों में फायर एनओसी की अवधि समाप्त हो चुकी है, लेकिन संचालन बदस्तूर जारी है। कुछ अस्पतालों में इमरजेंसी निकास तक नहीं हैं। कई जगह ऑक्सीजन सिलेंडरों का भंडारण सुरक्षा मानकों के विपरीत बताया जा रहा है। सवाल यह भी है कि यदि किसी दिन दिल्ली के विवेक विहार बेबी केयर सेंटर जैसी आगजनी की घटना गाजियाबाद में हो गई, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

हैरानी की बात यह है कि प्रशासन अक्सर किसी हादसे के बाद हरकत में आता है। जांच समितियां बनती हैं, नोटिस जारी होते हैं, कुछ दिनों तक कार्रवाई का दिखावा होता है और फिर पूरा मामला फाइलों में दफन हो जाता है। लेकिन तब तक कई परिवार अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कीमत चुका चुके होते हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शहर में दर्जनों अस्पतालों के संचालन को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है। क्या वजह है कि नियमों को ताक पर रखकर चल रहे अस्पतालों पर सीलिंग की कार्रवाई नहीं होती?

क्या इन अस्पतालों की “ऊपर तक सेटिंग” है?
क्या हर महीने मोटी रकम के दम पर मरीजों की जिंदगी को खतरे में डालने का लाइसेंस बांटा जा रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी अस्पताल के लिए फायर सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट, प्रशिक्षित स्टाफ, पार्किंग, वेंटिलेशन और भवन सुरक्षा सबसे बुनियादी जरूरतें हैं। लेकिन गाजियाबाद में कई अस्पताल केवल बोर्ड लगाकर “मल्टीस्पेशियलिटी” बन बैठे हैं।
अब सवाल जनता पूछ रही है—
— अगर कल कोई बड़ा हादसा हुआ तो क्या जिलाधिकारी, स्वास्थ्य विभाग, जीडीए और फायर विभाग उसके लिए जिम्मेदारी लेंगे?
— या फिर हमेशा की तरह कुछ अफसर कैमरे पर सख्ती दिखाकर मामला ठंडा कर देंगे?
— गाजियाबाद की जनता को इलाज चाहिए… मौत का इंतजाम नहीं।
— यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा तो आने वाला समय किसी बड़े हादसे की भयावह पटकथा लिख सकता है।